एक विचार पिछले कुछ दिनों से मन में कौंध रहा है, और वह विचार है कि शायद मुझे अब त्यागपत्र दे देना चाहिए। कितने आराम से लिख दिया की मुझे त्यागपत्र दे देना चाहिए। पर मुझे लगता है ये इतना आसान नहीं होगा , पर फिर सोचता हूँ की शायद ये इतना मुश्किल भी नहीं है। मेरे भारत की स्तिथि अभी बहुत अच्छी नहीं है। कोई भी व्यवस्था अपनी जगह पर दुरुस्त नहीं है इस समय। पर क्या इसका कारण मेरे वो निरणय है जिसको मैंने अब तक लिए हैं ये सोच कर की जो कर रहा हूँ वो सबसे बेहतर हैं।
क्या मुझे आजकल देश मे चल रही अनियमिताएं नहीं दिख रहीं हैं ? शायद नहीं क्योंकि इस समय देश में जो अर्थव्यवस्था की हालत है, और उससे उबरने के लिए किये गए उपाय गलत साबित हो रहें हैं साथ ही जो मजदूर पैदल ही घर जा रहें हैं वो भी तो एक नाकामी है मेरी। 50 वर्षो से हम गरीबी हटाओ की बात करते आये हैं मुझे याद है इंदिरा गाँधी ने 1971 का चुनाव "गरीबी हटाओ" के ही नारे पर लड़ा था। पर इस बीच बहुत सी सरकारें आई और चली गई पर आजतक गरीबी नहीं हैट पाई। इस देश पर राज करते हुए हम गरीबी और ग़रीबों को हमेशां भूले रहे।
आज जो कुछ भी सोशल मीडिया पर या टीवी पर मजदूरों से सम्बंधित दिखाया जा रहा है वो सब गलत है ये मान लेने से सच झूठ नहीं हो जायेगा। देश को सुचारु रूप से चलने की जिम्मेदारी मैंने ली है पर शायद मैं अभी तक अपना 100% नहीं दे पाया हूँ। इस समय जब की देश एक महामारी से लड़ रहा है और जो दावे मेरी सरकार द्वारा किये जा रहें हैं उसमे कहीं बहुत बड़ी गड़बड़ है। और ऐसे मे ये बात की भी संभावना है की जब भी हम इस महामारी से बाहर निकलेंगे एक इससे भी बड़ा संकट मुँह बाये खड़ा होगा और वो होगा बेरोजगारी का ! हम जो सहायता सरकार की तरफ से कर रहे हैं क्या वह वाकई में उस कतार मे खड़े अंतिम व्यक्ति को फायदा पहुंचाने वाली है? 30 करोड़ लोग कम से कम इस महामारी की वजह से अबतक बेरोजगार हो चुकें हैं। ये एक बड़ा संकट है। समस्या यह भी है की शहरों से गांव को लौटे लोग अब शायद जल्दी ही वापस भी ना लौटें ये एक बड़ा अर्थव्यवस्था का संकट खड़ा हो गया है। अब इन लोगों को दुबारा अपने पैरों पर खड़ा करना भी एक बड़ी समस्या है।
ये समझ आ गया की इतनी बड़ी त्रासदी के बाद भी हम कुछ नहीं सिख पाये। जहाँ तक ताली बजाना या दिया जलाना था वो एक जनमानस का विष्वास था मेरे प्रति या कहें की मेरे देशवासियो ने अपने कर्त्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन किया और मेरे प्रति आस्था प्रकट की कि मैं उन्हे इस संकट से उबार लूंगा पर अब ऐसा लग रहा है की वो विष्वास भी कमजोर पड़ रहा है। ऐसा नहीं है की मैं परेशान नहीं हूँ पर समाधान मेरे पास भी नहीं है शायद। मेरे द्वारा उठाये गए क़दमों से 100% लाभ देश को हुआ है ये कहना बेमानी होगा क्योंकि अगर ऐसा हुआ होता तो वो गरीब जो आज पैदल ही 1000 की मि अपने घर की तरफ चल चूका है वो नहीं होता। अब इस बात को समझना बहुत जरुरी है की देश अब तक औद्योगिक घरानो से नहीं चल रहा था अब तक देश चला रहे थे ये मजदूर, जो आज मजबूर होकर पैदल ही घर की तरफ जा रहें हैं। मन चाहता है की ये सब मेरे भाई बहन वापस बड़े शहरों मे आ जाएं पर शायद अब जल्द ही ऐसा नहीं होगा।
कभी कभी सोचता हूँ की लॉकडाउन कर के क्या पाया, एक भेड़ चाल जिसमें ये सोचने की जरुरत नहीं की बाड़े में जा रहें हैं की बूचड़खाने में !!! ये बीमारी या महामारी सिर्फ देश मे ही नहीं बल्कि मेरे आसपास व्याप्त लोगों की मानसिकता मे भी है। क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता तो अब तक जितना पैसा और एनर्जी इस लॉकडाउन मे और इसके प्रचार में बर्बाद किया इससे कम मे और बहुत पहले उन सब मजदूरों को घर पंहुचा सकता था। कौन मदद कर रहा है इन मजदूरों की आज? वो आम आदमी जिसे खुद नहीं पता उसका आने वाला कल कैसा है? पर फिर भी मानव सेवा मे पूरी तत्परता से लगा हुआ है। इस आम जनता के प्रति हमको नतमस्तक होना चाहिए।
हम नीतिनिर्धारकों को ये छोटी सी बात अब भी समझ नहीं आ रही है की देश बनाने वाले आज बेहाल है। नौकरशाही इस देश को नहीं चला पा रही है। समय आ गया है व्यवस्था परिवर्तन का? वातानुकूलित कमरे में बैठ कर, 45' गरमी में पैदल चल रहे लोगों का मर्म नहीं समझा जा सकता। उसको समझने के लिए खुद को उस स्तिथि में डालना होगा। आज की परिस्तिथि में खाना और सकुशल घर पहुंचना प्राथमिक्ता है और हमसे शायद ये प्राथमिकता का अनुमान गलत लग गया। इस देश में अब तक मूलभूत सुविधाओं का आभाव है। मेरे या पूर्वरत सरकरों ने अब तक इन सुविधाओं पर बहुत काम कार्य किया, और शायद यही कारण है आज देश की इस दुर्दशा का। हम आपसी राजनीती में ऐसे उलझे की राज करने की नीती ही भूल गए और अब भी जग नहीं पाएं हैं।
अब भी जब अकेला होता हूँ तो ये विचार मन में आता है कि क्या मै अपने कार्य में सफल रहा हूँ? मैं अपने जनसम्पर्क अभियान में जन से सम्पर्क ही स्थापित नहीं कर पाया। और इसका बहुत बड़ा कारण ये व्यवस्था है और इसको चलाने वाले लोग हैं, हम नेता शायद हर 5 साल मे बदलते रहे हैं पर जो नहीं बदली है वो है नौकरशाही और इसी न बदल पाई व्यवस्था के कारण देश शायद आज भी वहीँ खड़ा है जहाँ अंग्रेज छोड़ कर गए थे। और तब जाते हुए अंग्रेजो ने कहा था की जब हम इस देश को छोड़ कर जाएंगे तो ये देश बिखर जायेगा क्योंकि इस देश को चलाने वाले आपस में ही एक दूसरे की टांग खीचेंगे। और आज की स्तिथि को देख कर लगता है की शायद वो गलत नहीं थे।
आजादी से लेकर आज तक किसी भी सरकार ने देश से बस सच छुपाने का काम किया है और हमने भी इसी परम्परा को आगे बढ़ाया। मानव सभ्यता की शुरुवात से ही कुछ दोष रहें हैं पर उन दोषों पर जिसने विजय पाई है वो इतिहास मे अमर हो गया। शायद अब सही समय है निर्णय करने का मेरे लिए - की मैं किस राह पर चलना चाहता हूँ।