10 मई 1857 का दिन भारत वर्ष के इतिहास मे स्वर्णिम अक्षरों से लिखा गया है, यही वो दिन था जब भारत मे सम्पूर्ण क्रांति की तरफ पहला कदम बढाया था. आज भी 10 मई है और वो क्रांति की गाथा अब सिर्फ किताबों मे सिमट कर अपनी अस्तित्वा को तलाश रही है, समय बदला लोग बदले और शायद अब देश भी बदल गया है. आज हर तरफ आधुनिकता का बोलबाला है, किसी के पास अब इतना वक़्त ही नहीं बचा की वो कुछ समय देश को दे सके. आज देशभक्ति का मतलब सिर्फ ये रह गया है की हम क्रिकेट के मैच मे बैठ कर तिरंगा लहरा लेते हैं, या फिर 15 अगस्त और 26 जनुअरी को रेडियो और टीवी पे देशभक्ति के गाने सुन कर और शायद कुछ जगहों पर राष्ट्रगान पर सीधे खड़े हो कर अपनी देशभक्ति का प्रदर्शन कर देते है.
1857 की क्रांति एक कदम था बदलाव की तरफ, पर अब हम ही बदल चुकें हैं. क्या कारण रहा इन बीते सालों मे की हम आज अपने सिधान्तो और मूल्यों से मुह मोड़ते चले जा रहे हैं. आज़ादी का मतलब अगर लूटमार करना, डकैती डालना, बलात्कार करना और लोगों को धोखा देना है तो क्या हम सही मायने मे आजाद हैं? सोचने वाली बात ये है की आज अगर हमारी 70% आबादी एक वक़्त भी अपना पेट नहीं भर पा रही तो इसका जिमेदार कौन है? अगर आज हमारे नेता उद्योगपतियों से भी ज्यादा आमिर हैं और आमिर गरीब के बीच की खाई और गहरी होती जा रही है तो क्या यह विषय सोचनिए नहीं है.
बहुत से ऐसे मुद्दे हैं हमारे देश मे जिनका सीधा सम्बन्ध आम जनता से है, ये आम लोग वो हैं जो आज भी अपनी रोज्मरा की ज़रूरतों के लिए जिसमे दो वक़्त का खाना, पहनने के लिए साफ़ सुथरे कपडे और सर छुपने के लिए एक अदद छत की मामूली सी ख्वाइश पूरी करने मे लगे हुएं हैं. इसमे भी प्राथमिकता खाने की है की आज हमने खा लिया पर कल क्या खाना है इसी सोच मे आधी से ज्यादा आबादी हमारे देश की अपना पूरा जीवन व्यतीत कर देती है.
आज देश को आज़ादी मिले 65 साल हो चेकें हैं पर हमारे देश की सरकार चलाना वालों की मानसिकता अब भी देश पर राज करने वालों जैसी है शायद उसका कारण ये हो सकता है की हम अभी भी प्रयोग कर रहे हैं, और वो प्रयोग पिछले 65 सालों से फेल हो रहे हैं पर तब भी हमारी प्रोयोग करने की प्रवृति ख़तम नहीं हुई है. और देश चलाने वाले भी सोचते हैं की कभी तो सफलता मिलेगी. सफलता मिलने के लिए नियत का ठीक होने अनिवार्य है, अन्यथा सफलता कई बार ऐसी सफलता मिलने का भी फायदा बहुत कम समय के लिए होता है. पुर्वारत ऐसे कई मौके रहे हैं जिसमे हमे ऐसी हे सफलताओं को परखने का मौका मिला है और ज्यादातर मामलों मे निराशा ही हाथ लगी है. हमारी भोगोलिक स्तिथि और संस्क्रती ऐसी है की हम बडे संतोषी जीव हैं इसी का फायदा पुर्वारत मुस्लिम हमलावरों और अंग्रेजों ने उठाया था, और आज के समय मे हमारे ये देशी अंग्रेज उठा रहे हैं.
10 मई हर साल आती है पर विश्वास कीजिये बहुत कम ही ऐसे लोग हैं जो इस दिन को क्रन्तिकारी दिवस के रूप मे मानते हैं और सचे मन से अपने देश की तरफ कृतज्ञता प्रकट करते हैं. हाँ आज आप ये ज़रूर दिखेंगे की हमरे देश के पालनहार कुछ शहीदों की मूर्तियों पर फ्होल चादेंगे और इसी बहाने साल मे एक बार उन मूर्तियों की साफ़ सफाई हो जाती है. देश के लिए किये गए उनके अतुल्य बलिदान पर इतना हक तो बनता है. शायद ये एक ऐसी मजबूरी बन गई है हमारे देश की की हम ये सब सोचना हे नहीं चाहते और शायद ये भी है की सिर्फ सोच कर हम क्या कर लेंगे हमारे पास अपनी दाल रोटी की चिंता करने से हे समय नहीं बच रहा देश के बारे मे सोचने के लिए तो सरकार है ही जिसे शायद हमने नहीं चुना क्योंकि वोट वाला दिन तो चुटी का होता है और कभी कभी तो ऐसा दिन आता है उस दिन तो परिवार के साथ बिताएं. और ये भी एक कारण है जिस वजह से हम आज 65 साल मे और भी पीछे चले गायें हैं तरक्की सिर्फ कागजों मे है उस तरक्की से आम जनता का कोई बहुत भला नहीं हुआ और इस तरह से होगा भी नहीं.
उम्मीद पर दुनिया कायम है और हम भी यही सोच रहे हैं की हमारा आने वाला कल बहुत उज्जवल होगा यही सोच उन क्रांतिकारियों की थी जिन्होने आज़ादी की लड़ाई मे अपने प्राणों की आहुति दे दी और देश को आज़ादी दिलवाई, बारी अब हमारी है और हमे जागना होगा बहुत सो चुके हैं, और कुछ तो ऐसा कर के जाएँ की आने वाली पीढ़ी साल के किसी एक दिन हमे भी याद करे. .